
उत्तराखंड के चौखुटिया विकासखंड के गांवों में इन दिनों विकास की गाथा नेटवर्क की खोज में रुकी हुई है। आलम यह है कि ग्राम पंचायतों का गठन हुए पूरा एक साल बीत गया है, लेकिन सरकारी ‘पोर्टल’ है कि खुलने का नाम ही नहीं ले रहा। पोर्टल बंद, तो बजट बंद और बजट बंद, तो गांव की खड़ंजा, नहर और पानी की टंकियां भी जस की तस ठप पड़ी हैं।
परेशान होकर क्षेत्र के प्रधानों ने सीधे मुख्यमंत्री दरबार की ओर पत्रों का रुख किया है, लेकिन इन चिट्ठियों में समस्याओं से ज्यादा 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए तीखे ‘सियासी चेतावनी के सुर’ गूंज रहे हैं।

तीन पत्र, एक दर्द और 2027 का डर
नौनाँ बेकिया के प्रधान जसवन्त सिंह बिष्ट का कहना है कि पूरे साल से पोर्टल न खुलने की वजह से गांव में एक भी विकास कार्य शुरू नहीं हो पाया है। गांव वालों का गुस्सा लगातार बढ़ रहा है और अगर समय रहते पोर्टल नहीं खुला, तो इसका बहुत बुरा असर 2027 के चुनावों में भुगतना पड़ेगा।
न्यौनी ग्राम पंचायत के प्रधान उमेद सिंह मेहरा ने भी सुर में सुर मिलाते हुए सीधे मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में चेतावनी दी है कि एक साल का कार्यकाल बिना काम के बीत गया है। प्रधानों का यह आक्रोश 2027 के विधानसभा चुनावों में समीकरण बिगाड़ सकता है, इसलिए पोर्टल को अविलंब खोला जाए।
कोट्यूड़ा ताल की महिला प्रधान गंगोत्री देवी ने पहाड़ी क्षेत्र की जमीनी हकीकत पर रोशनी डाली है। उनका कहना है कि 16वें वित्त का बजट तो अटका ही है, ऊपर से ‘VB GRAMG’ के तहत अनिवार्य की गई ‘डिजिटल अटेंडेंस’ गले की फांस बन गई है। पहाड़ों की विकट भौगोलिक स्थिति और गायब मोबाइल नेटवर्क के बीच ऑनलाइन हाजिरी लगाना किसी एवरेस्ट चढ़ने से कम नहीं है
नेटवर्क की तलाश में विकास
चौखुटिया के ग्रामीण इलाकों में स्थिति यह बन चुकी है कि प्रधान जी को हाजिरी लगाने के लिए मोबाइल हाथ में लेकर पेड़ पर चढ़ना पड़ रहा है या किसी ऊंची पहाड़ी की चोटी पर नेटवर्क की तलाश करनी पड़ रही है। उधर गांव के विकास कार्य बंद पड़े हैं और इधर चुनावी घंटी बजने की सुगबुगाहट अभी से महसूस होने लगी है।
अब देखना यह होगा कि शासन-प्रशासन इस ‘डिजिटल ताले’ की चाबी कब खोज पाता है, या फिर 2027 के चुनाव में जनता अपना अलग ही ‘पोर्टल’ खोलकर जवाब देती है!



